Sunday, December 24, 2017

काश मैं पानी बन जाता.....




रूपहीन ,रंगहीन , गंधहीन , स्वाद हीन और तापहीन 
सरल और तरल 
काश मैं पानी बन जाता ! 
निकल ब्रह्म कमंडल से, 
छूकर जटा महादेव की,
पर्वत-पर्वत, जंगल -जंगल 
ग्राम ,नगर और बस्ती- बस्ती 
कल-कलछल- छल,
छन-छन कर भी 
सबसे मिलता,
सबको मिलता, 
जीवन देता, 
जीवन जीता, 
संकरीविस्तृत,
तिरक्षि, टेढ़ी, पथरीली 
राहों से चलकर, 
सागर से संगम बनकर 
ब्रह्म कमंडल में फिर  जाता 
काश मैं पानी बन जाता !

राजीव सिंह

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