रूपहीन ,रंगहीन , गंधहीन , स्वाद हीन और तापहीन
सरल और तरल
काश मैं पानी बन जाता !
निकल ब्रह्म कमंडल से,
छूकर जटा महादेव की,
पर्वत-पर्वत, जंगल -जंगल
ग्राम ,नगर और बस्ती- बस्ती
कल-कल, छल- छल,
छन-छन कर भी
सबसे मिलता,
सबको मिलता,
जीवन देता,
जीवन जीता,
संकरी, विस्तृत,
तिरक्षि, टेढ़ी, पथरीली
राहों से चलकर,
सागर से संगम बनकर
ब्रह्म कमंडल में फिर आ जाता
काश मैं पानी बन जाता !
राजीव सिंह

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