हलचल है झील कि सतह पर ,
यूँ लगता है कोई कंकड़ टपका है ।
मानो भीतर भी वही है
जो बाहर दिखता है ,
वैसी ही चहल पहल ,
वैसी ही चका चौंध ।
जो दिखता है ,
है वही अगर सत्य ,
तो वो स्थिर रहेगा , जब तक रहेगा ,
हिलेगा नहीं ... अनंत काल तक
कभी बदलेगा नहीं रंग,
अनाम रहेगा इसका रंग...
थोड़ा ठहरो, प्रतीक्षा करो ,देखो जो हो रहा है द्रष्टा बनकर ,
निश्चय ही सब पारदर्शी हो जाएगा ...
सतह पर और सतह के भीतर की अनंत गहराई में ,
जो कुछ भी है
उसके होने का आभास ही नहीं
अहसास भी हो जाएगा ...
शांत होने दो कंकड़ से बनी तरंगों को...
थोड़ा ठहरो प्रतीक्षा करो देखो जो हो रहा है द्रष्टा बनकर ..
राजीव सिंह
