Sunday, December 24, 2017

काश मैं पानी बन जाता.....




रूपहीन ,रंगहीन , गंधहीन , स्वाद हीन और तापहीन 
सरल और तरल 
काश मैं पानी बन जाता ! 
निकल ब्रह्म कमंडल से, 
छूकर जटा महादेव की,
पर्वत-पर्वत, जंगल -जंगल 
ग्राम ,नगर और बस्ती- बस्ती 
कल-कलछल- छल,
छन-छन कर भी 
सबसे मिलता,
सबको मिलता, 
जीवन देता, 
जीवन जीता, 
संकरीविस्तृत,
तिरक्षि, टेढ़ी, पथरीली 
राहों से चलकर, 
सागर से संगम बनकर 
ब्रह्म कमंडल में फिर  जाता 
काश मैं पानी बन जाता !

राजीव सिंह

Thursday, November 23, 2017

थोड़ा ठहरो प्रतीक्षा करो देखो जो हो रहा है द्रष्टा बनकर ..

हलचल है झील कि सतह पर ,
यूँ लगता है कोई कंकड़ टपका है ।
मानो भीतर भी वही है 
जो बाहर दिखता है ,
वैसी ही चहल पहल ,

वैसी ही चका चौंध ।

जो दिखता है ,
है वही अगर सत्य ,
तो वो स्थिर रहेगा , जब तक रहेगा ,
हिलेगा नहीं ... अनंत काल तक 
कभी बदलेगा नहीं रंग,
अनाम रहेगा इसका रंग...

थोड़ा ठहरो, प्रतीक्षा करो ,देखो जो हो रहा है द्रष्टा बनकर ,
निश्चय ही सब पारदर्शी हो जाएगा ... 
सतह पर और सतह के भीतर की अनंत गहराई में ,
जो कुछ भी है 
उसके होने का आभास ही नहीं 
अहसास भी हो जाएगा ...
शांत होने दो कंकड़ से बनी तरंगों को... 
थोड़ा ठहरो प्रतीक्षा करो देखो जो हो रहा है द्रष्टा बनकर ..

राजीव सिंह