Saturday, October 17, 2015

अंतर्मन: एक बहती नदी सा.....



शहर वही और वहीँ  था पर मैं बदलने लगा 
शहर के लोग वही और वहीँ  थे  पर नज़रिया बदलने लगा 
विचार अब भी हैं हलचल अब भी है 
पर अंतर्मन का  स्वरूप बदल रहा है
अब वो कुछ जाने कुछ अनजाने चेहरे वाली भीड़
 और भीड़ की धक्का मुक्की में उलझा एक शहर नहीं 
अंतर्मन मानो अब एक बहती नदी सा है 
बहते हुए विचारों की एक नदी 
मैं किनारे पर पड़े एक शिलाखंड की तरह 
और विचार बहते हुए जलकतरों की तरह 
एक सतत प्रवाह में  आते और जाते 
ना ठहरते ना हँसाते और ना ही डराते
बस आते और जाते … 

राजीव सिंह 


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