फिर लौटा हूँ अंतर्मन के पथ पर ,
शहर वही ,विचार वही हैं
आवागमन भी जारी है !
मैं ठहर रहा हूँ,
तटस्थ हो रहा हूँ !
एकांत में,
एक आसन मिल रहा है,
तन स्थिर ,
पर मन स्थिर होना
अब भी बाकी है,
भीड़ है, शोर भी है,
भय और आशंकाएं भी हैं ,
पर एक संकल्प है ,
पीहे हटना नहीं है ,
अब तो बस
विचारों के इस शहर को,
देखना , सुनना और समझना है
अंतर्ध्वनि को सुनकर ,
अंतर्मन के पथ पर चलना है !
राजीव सिंह
