Saturday, August 23, 2014

अंतर्मन के पथ पर चलना है....


फिर लौटा हूँ अंतर्मन के पथ पर ,
शहर वही ,विचार वही हैं
आवागमन भी जारी है !

मैं ठहर रहा हूँ,
तटस्थ हो रहा हूँ !

एकांत में, 
एक आसन  मिल रहा है,
तन स्थिर ,
पर मन स्थिर होना 
अब भी बाकी है, 
भीड़ है, शोर भी है,
भय और आशंकाएं भी हैं ,  
पर एक  संकल्प है ,
पीहे हटना नहीं है ,
अब तो बस 
विचारों  के इस शहर  को,
देखना , सुनना और समझना है
अंतर्ध्वनि को  सुनकर ,
अंतर्मन के पथ पर चलना है  !

राजीव सिंह 

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