Saturday, August 23, 2014

अंतर्मन के पथ पर चलना है....


फिर लौटा हूँ अंतर्मन के पथ पर ,
शहर वही ,विचार वही हैं
आवागमन भी जारी है !

मैं ठहर रहा हूँ,
तटस्थ हो रहा हूँ !

एकांत में, 
एक आसन  मिल रहा है,
तन स्थिर ,
पर मन स्थिर होना 
अब भी बाकी है, 
भीड़ है, शोर भी है,
भय और आशंकाएं भी हैं ,  
पर एक  संकल्प है ,
पीहे हटना नहीं है ,
अब तो बस 
विचारों  के इस शहर  को,
देखना , सुनना और समझना है
अंतर्ध्वनि को  सुनकर ,
अंतर्मन के पथ पर चलना है  !

राजीव सिंह 

Tuesday, August 19, 2014

अंतर्मन के पथ पर....


आँखे बंद कर, 
अंतर्मन के पथ पर चलने लगा तो देखा,
विचारों की,
एक घनी आबादी वाला शहर,
भीतर ही  भीतर,
पसारता चला जा रहा है,
जाने कैसे कैसे,
कहाँ कहाँ से आये विचार,
गिनती अनगिनत है
और गिनती प्रतिपल बढ़ती ही  जा रही है
आते हैं , कुछ पल ठकहरते है , चले जाते हैं
कभी कभी मुझे भी अपने साथ
कुछ दूर तक ले जाते हैं ,
और फिर छोड़  जाते हैं ,
किसी और विचार के पास !

कुछ चोट करते हैं ,
कुछ सहलाते हैं ,
कुछ अजीब से चेहरे बनाकर चिढ़ाते ,डराते  और भटकाते हैं ,
कुछ मुस्कुराकर हँसाते , समझाते, फुसलाते और बहलाते हैं
और फिर छोड़कर चले जाते हैं ,
एक नए विचार के पास !

भीतर ही भीतर पसरा हुआ है, 
अंदाजा ही  नहीं था,
इतनी हलचल, इतना शोर लिए,
इतना जटिल  और इतना विस्तृत,
विचारो का एक शहर !

भीड़ बहुत है, शोर  बहुत है, 
शोरगुल अब डराने लगा है,
सांसें बिगड़ने लगी हैं  ,
मन बेचैन हो उठा है ,
ह्रदय के धड़कने तेज़,
और कानो के परदे हिलने लगे हैं  ,
जिह्वा सूखने और 
आँखे चौंधियांने  लगी हैं  ,
जबड़े जकड़ने और 
हाथ, पैर  कांपने से लगे हैं ,
ठहरना चाहता हूँ !

भीड़ ठहरने नहीं देती 
कोई किनारा नहीं देती 
कोई सहारा नहीं देती 
चलने नहीं देती ,
रुकने भी नहीं देती !

भागो मन कहता है भागो,
पूरा ज़ोर लगाकर बस  भागो !

भागा मन भागा, 
पूरा ज़ोर लगाकर भागा ,
धक्का मुक्की, ठेला ठेली, 
इसको मारा, उसको मारा, 
कितनो को कुचला, कितनो को मसला, 
चीख- पुकार , 
पीड़ा, फटकार 
और प्यार,
एक सुनी न ,
भागा मन बस भागा, 
पूरा ज़ोर लगाकर भागा  !

थक गया ,
थक कर चूर हो गया !
ठोकर सी लगी,
और गिर गया,
गिर गया ,
और गिरकर 
आँखे खुल गयी !

सन्नाटा ,
बाहर पसरा हुआ है सन्नाटा, 
बच्चों की किलकारी,
माँओं के प्रेम की पिचकारी, 
भौंरो की गुनगुनाहट,  
चिड़ियों की चहचाहट, 
पेड़ों पर पत्तों की 
हवा से फुफुसाहट ,
और रेलगाड़ी की धड़धड़ाहट ,
सब मानो संगीत हो !

अंतर से एक ध्वनि आई ,
विचार हैं , सब विचार ,
विचारों से क्या डरना ,
एक एक से मिलना ,
जानना और समझना,
बस इतना ही  तो है करना !

कायर था मन,
डरकर भाग रहा था,
अंतर मन के पथ पर

अंतर्ध्वनि से मुंह फेर रहा था !

                                                                                                             राजीव सिंह