Monday, September 22, 2014

जिनसे भी पथ पर स्नेह मिला...उन सबको मेरा ह्रदय प्रणाम .....!


                                                    जिनसे भी पथ पर स्नेह मिला...उन सबको मेरा ह्रदय प्रणाम....।  
  जीवन की तिरछी टेढ़ी पथरीली राहों पर, 
  पग के छालों की पीड़ा को सहलाते,
  एकाकीपन में , वीराने में , अनजाने में ,
          दो स्नेह-शब्द दे दिए जिन्होंने... उन सबको मेरा ह्रदय प्रणाम......। 

कुछ पल जो साथ रहे, कुछ दूरी  तक जो साथ चले, 
जिनके  के पग कुछ तेज़ चले, जिनसे मेरे पग कुछ तेज़ चले ,
चाहे कुछ पल का स्नेह  रहा.…चाहे कुछ दूरी तक का  साथ रहा, 
थपकी , झपकी, भपकी उन  सबकी, 
न होती तो  कैसे और कितना चल पाता,
कहना कठिन बहुत है,,, 
पथ के वो पहचाने छूट गए.
 कुछ टूट गए , कुछ रूठ गए ,
कुछ छटक गए कुछ भटक  गए.. 
पर यादो  की गठरी छोड़ गए.. 
आभारी हूँ  उन सबका भी , दे गये व्यथा का जो  प्रसाद मुझे 

पर जिनसे भी पथ पर स्नेह मिला...उन सबको मेरा ह्रदय प्रणाम .....!

                                              
                                             राजीव सिंह 




Saturday, August 23, 2014

अंतर्मन के पथ पर चलना है....


फिर लौटा हूँ अंतर्मन के पथ पर ,
शहर वही ,विचार वही हैं
आवागमन भी जारी है !

मैं ठहर रहा हूँ,
तटस्थ हो रहा हूँ !

एकांत में, 
एक आसन  मिल रहा है,
तन स्थिर ,
पर मन स्थिर होना 
अब भी बाकी है, 
भीड़ है, शोर भी है,
भय और आशंकाएं भी हैं ,  
पर एक  संकल्प है ,
पीहे हटना नहीं है ,
अब तो बस 
विचारों  के इस शहर  को,
देखना , सुनना और समझना है
अंतर्ध्वनि को  सुनकर ,
अंतर्मन के पथ पर चलना है  !

राजीव सिंह 

Tuesday, August 19, 2014

अंतर्मन के पथ पर....


आँखे बंद कर, 
अंतर्मन के पथ पर चलने लगा तो देखा,
विचारों की,
एक घनी आबादी वाला शहर,
भीतर ही  भीतर,
पसारता चला जा रहा है,
जाने कैसे कैसे,
कहाँ कहाँ से आये विचार,
गिनती अनगिनत है
और गिनती प्रतिपल बढ़ती ही  जा रही है
आते हैं , कुछ पल ठकहरते है , चले जाते हैं
कभी कभी मुझे भी अपने साथ
कुछ दूर तक ले जाते हैं ,
और फिर छोड़  जाते हैं ,
किसी और विचार के पास !

कुछ चोट करते हैं ,
कुछ सहलाते हैं ,
कुछ अजीब से चेहरे बनाकर चिढ़ाते ,डराते  और भटकाते हैं ,
कुछ मुस्कुराकर हँसाते , समझाते, फुसलाते और बहलाते हैं
और फिर छोड़कर चले जाते हैं ,
एक नए विचार के पास !

भीतर ही भीतर पसरा हुआ है, 
अंदाजा ही  नहीं था,
इतनी हलचल, इतना शोर लिए,
इतना जटिल  और इतना विस्तृत,
विचारो का एक शहर !

भीड़ बहुत है, शोर  बहुत है, 
शोरगुल अब डराने लगा है,
सांसें बिगड़ने लगी हैं  ,
मन बेचैन हो उठा है ,
ह्रदय के धड़कने तेज़,
और कानो के परदे हिलने लगे हैं  ,
जिह्वा सूखने और 
आँखे चौंधियांने  लगी हैं  ,
जबड़े जकड़ने और 
हाथ, पैर  कांपने से लगे हैं ,
ठहरना चाहता हूँ !

भीड़ ठहरने नहीं देती 
कोई किनारा नहीं देती 
कोई सहारा नहीं देती 
चलने नहीं देती ,
रुकने भी नहीं देती !

भागो मन कहता है भागो,
पूरा ज़ोर लगाकर बस  भागो !

भागा मन भागा, 
पूरा ज़ोर लगाकर भागा ,
धक्का मुक्की, ठेला ठेली, 
इसको मारा, उसको मारा, 
कितनो को कुचला, कितनो को मसला, 
चीख- पुकार , 
पीड़ा, फटकार 
और प्यार,
एक सुनी न ,
भागा मन बस भागा, 
पूरा ज़ोर लगाकर भागा  !

थक गया ,
थक कर चूर हो गया !
ठोकर सी लगी,
और गिर गया,
गिर गया ,
और गिरकर 
आँखे खुल गयी !

सन्नाटा ,
बाहर पसरा हुआ है सन्नाटा, 
बच्चों की किलकारी,
माँओं के प्रेम की पिचकारी, 
भौंरो की गुनगुनाहट,  
चिड़ियों की चहचाहट, 
पेड़ों पर पत्तों की 
हवा से फुफुसाहट ,
और रेलगाड़ी की धड़धड़ाहट ,
सब मानो संगीत हो !

अंतर से एक ध्वनि आई ,
विचार हैं , सब विचार ,
विचारों से क्या डरना ,
एक एक से मिलना ,
जानना और समझना,
बस इतना ही  तो है करना !

कायर था मन,
डरकर भाग रहा था,
अंतर मन के पथ पर

अंतर्ध्वनि से मुंह फेर रहा था !

                                                                                                             राजीव सिंह 



Friday, March 14, 2014

महक उठा मन देखो फिर आया है मधुमास



महक उठा मन देखो फिर आया है मधुमास
बहक उठा तन देखो आया फिर है मधुमास 
उलझा मन ह्रदय बेचैन

उलझा सा जीवन पथ ...
उलझ चुके थे रिश्तों के सब तार 

तब आया बसन्त , फागुनी गीत लिए
कानों में गुनगुन, नयनों में प्रीत लिए
फूंक दिए प्राण फिर जीवन पंथ पर 
महक उठा मन देखो ,फिर आया है मधुमास 

अंबर की छांव तले, फिर छाया है उल्हास
कण कण में घुलने लगा है जीवन का सार
जड और चेतन सबको मिला फिर से सुखमय आधार
तृप्त हुआ अन्तरमन आदि और अनन्त में

महक उठा मन देखो फिर आया है मधुमास
बहक उठा तन देखो फिर आया है मधुमास

राजीव सिंह