Friday, May 25, 2012

फिर भी बहता जीवन


कुटिल विवशता छलती जाती
फिर भी बहता जीवन
कटी पतंग उड़ाता है क्यों
ओ मेरे चंचल मन

धूप-धूप चलते-चलते
सब झुलस चुकी है काया
फूट चुके हैं पग छाले सब
धीरज भी चुक आया
पथ कंटकाकीर्ण है फिर भी
तू चलता हर्षित मन
फिर भी बहता जीवन

एकाकी जीवन का सूना
कोलाहल कानों में
प्यासा अंतस् सूख रहा है
अंधकार भावों में
नागफणी का पुष्पहार ले
मत निहार चंचल मन
फिर भी बहता जीवन

पंकित गलियारे जीवन के
नहीं नीर आँखों में
दीप शिखा भी स्नेह रहित है
निराधार हाथों में
डोल रहा जीवन लहरों संग
तू बावरा मेरा मन
फिर भी बहता जीवन