Saturday, November 24, 2012

क्यों रहते हो उखड़े उखड़े ....?




क्यों रहते हो उखड़े उखड़े ...?

  जीवन में जीवनभर भटके....
     
 जब जब आई पास तुम्हारे....

 बैठे रहे तुम ही  मन मारे....

 छुई मुई सा मुरझा जाते....

 खिलते जैसे फूल से मुखड़े ...!

 साथ  साथ पर रहे अकेले.... 

 कितने बोझ ग़मों के झेले....

 घुट घुट कर अरमान मर गए....

 कह न सके पर दिल के दुखड़े ...!!  

 क्यों रहते हो उखड़े उखड़े ....?


अंतर्ध्वनि में  यह ध्वनि  प्रिया  सिंह के मन से  

 

Friday, May 25, 2012

फिर भी बहता जीवन


कुटिल विवशता छलती जाती
फिर भी बहता जीवन
कटी पतंग उड़ाता है क्यों
ओ मेरे चंचल मन

धूप-धूप चलते-चलते
सब झुलस चुकी है काया
फूट चुके हैं पग छाले सब
धीरज भी चुक आया
पथ कंटकाकीर्ण है फिर भी
तू चलता हर्षित मन
फिर भी बहता जीवन

एकाकी जीवन का सूना
कोलाहल कानों में
प्यासा अंतस् सूख रहा है
अंधकार भावों में
नागफणी का पुष्पहार ले
मत निहार चंचल मन
फिर भी बहता जीवन

पंकित गलियारे जीवन के
नहीं नीर आँखों में
दीप शिखा भी स्नेह रहित है
निराधार हाथों में
डोल रहा जीवन लहरों संग
तू बावरा मेरा मन
फिर भी बहता जीवन