क्यों रहते हो उखड़े उखड़े ...?
जीवन में जीवनभर भटके....
जब जब आई पास तुम्हारे....
बैठे रहे तुम ही मन मारे....
छुई मुई सा मुरझा जाते....
खिलते जैसे फूल से मुखड़े ...!
साथ साथ पर रहे अकेले....
कितने बोझ ग़मों के झेले....
घुट घुट कर अरमान मर गए....
कह न सके पर दिल के दुखड़े ...!!
क्यों रहते हो उखड़े उखड़े ....?
अंतर्ध्वनि में यह ध्वनि प्रिया सिंह के मन से


कुटिल विवशता छलती जाती