Friday, November 04, 2011

मेरा मन......




अनंत आकाश की अनंत ऊँचाइयों में 
भटकता मेरा मन, 
तलाशता फिरता है अपने अस्तित्व को ,
कहाँ से चला , क्यूं और कैसे चला ,
इस तरह के एक विचार नहीं,
विचारों की गांठ में 
उलझ गया है मेरा मन ...!

यथार्थ  के इन प्रश्नों पर 
अपनी उर्जा व्यय करता ,
सागर की फिसलन भरी गहराइयों   में 
फिसलता हुआ ,
आ पहुंचा है उस बिंदु पर ,
जहाँ हर तरफ काई है 
जिसके स्पर्श मात्र से 
फिसलता जाता है, 
यथार्थ  से और अधिक दूर मेरा मन ..!

पीछे भागता है उस यथार्थ के, 
जो दिखाई देता है उस बिंदु पर, 
जहाँ आकाश का धरती से मिलन है, 
और इसी   रेगिस्तान सी मरीचिका में 
फंस कर रह गया है मेरा मन...!


क्या होगा इसका अस्तित्व 
और क्या यथार्थ ,
कब पहुंचेगा ये उस बिंदु पर 
और कब होगी खत्म इसकी तलाश, 
इन्ही प्रश्नों का हल तलाशता 
मुझसे कहीं दूर चला गया है मेरा मन.....!! 

राजीव सिंह