जीवन के एकाकी पथ पर
अपने हाथों से,
अपने सारे स्वप्न लुटाकर,
चलता पथिक निरंतर !
जीवन की आपाधापी में
अपने मन से ,
अपना जीवन आधार भुलाकर,
चलता पथिक निरंतर !
जीवन की तिरछी, टेढ़ी पथरीली रहों पर
पग अपने सहला सहला कर ,
थकता , रुकता पर -
चलता पथिक निरंतर !
जीवन के लम्बे इस गलियारे में
अगडित इसको प्रश्न मिले,
कुछ के उत्तर, कुछ निर्रुत्तर,
सोचता , समझता पर-
चलता पथिक निरंतर !
जो बीत गया उनकी यादो को लेकर,
कल के सपनो को आँखों में भरकर ,
सुख में , दुःख में, हँसता, रोता
निःशब्द और निरंतर
चलता पथिक निरंतर !
राजीव सिंह

