Sunday, August 28, 2011

चलता पथिक निरंतर !


जीवन के  एकाकी पथ पर 
अपने हाथों से,
अपने सारे स्वप्न लुटाकर, 
चलता पथिक निरंतर ! 

जीवन की आपाधापी में 
अपने मन से ,
अपना जीवन आधार भुलाकर,
चलता पथिक निरंतर !

जीवन की तिरछी, टेढ़ी पथरीली रहों पर 
पग अपने सहला सहला कर ,
थकता , रुकता  पर -
चलता पथिक निरंतर !

जीवन के लम्बे इस गलियारे में 
अगडित इसको  प्रश्न मिले, 
कुछ के उत्तर,  कुछ निर्रुत्तर, 
सोचता , समझता पर- 
चलता पथिक निरंतर !

जो बीत गया उनकी यादो को लेकर, 
कल के सपनो को आँखों में भरकर  ,  
सुख में , दुःख में, हँसता, रोता 
निःशब्द  और निरंतर 
चलता पथिक निरंतर ! 


राजीव सिंह