Thursday, August 11, 2011

सपने और हकीकत




   कितने अलग होते हैं
  हकीकत से सपनें ,
सपने ,
 बुने जाते हैं 
  सम्भावानावों के सुनहरे धागों से
हकीकत, 
उलझ कर रह जाती है  
अनगिनत अधूरे ख्वाबों में

 सपने,
जीने की वजह 
हकीकत जीने को कहते हैं 
सपने दूर कहीं मन के आसमान में 
हकीकत यहीं ज़मीन पर होती है 
आने वाली खुशियों के ताने बने से बुने 
सपने सिर्फ सुन्दर होते हैं
और हकीकत कई रंगों की
इन्द्रधनुषी या बेरंगी 
निर्भर करती है
सपनों के पूरे या अधूरे रह जाने पर  !
सपने इंसान बुनता है
हकीकत न जाने कहाँ से आती है
   सपनों पर इन्सान का बस चलता है 
 हकीकत इन्सान स्वीकार करता है 
  इसीलिए सिर्फ सपने अपने हैं
   और यही हकीकत है इन्सान की   !!

राजीव सिंह 

मां... तुम्हारी याद आई है!

 देह में  जमने लगी बहती नदी है 

साँस लेने में लगी पूरी सदी है 
चेतना पर धुंध छाई है 
मां... तुम्हारी याद आई है!

हम गगन में हैं 
न धरती पर 
बस हवावों में हवाएं हैं 
धूप की कुछ गुनगुनी किरनें 
ये तुम्हारी ही  दुआएं हैं 
कान जैसे सूर के पद सुन रहे हैं 
किन्तु मन के तार सब अवगुन रहे हैं 
गोद में सर रख ज़रा सो लूं 
फिर जनम भर रात जगाई है ! 


जंगलो से तू बचा लाइ 
एक बसंती अभय देकर 
लोरियां हम को सुनाती है 
फिर वही रंगीन लय लेकर 


प्यार से सर पर रखा आँचल तुम्हारा 
मैं तभी से युद्ध कोई भी न हारा

मां... तुम्हारी याद आई है!