Monday, April 04, 2011

मैं सपने देखता हूँ


(१)
मैं सपने देखता हूँ
सुन्दर और सतरंगी
मेरे सपनों में जीवन है
नदियाँ और झरने हैं
सागर और सूरज, चाँद, तारे और नदी के किनारे हैं
हवावों में गीत, जीवन में संगीत
ऊँचा पर्वत , गहरा सागर
लहराते पेड़ , लहलहाते खेत
कभी आंसू और कभी मुस्कान
सब कुछ है !
(2)
मैं सपने देखता हूँ
सुन्दर और सतरंगी
मेरे सपनो में मैं हूँ
कुछ अपने और  कुछ अनजाने हैं
राहें  पथरीली, रास्ता अनजाना 
पर मंजिल जानी  पहचानी है 
हाँ बिलकुल पहचानी है
शिखर पर मैं और मेरे साथ वही सपने 
सुन्दर और सतरंगी

राजीव सिंह

शहर


कितनी ऊँची इमारतें हैं यहाँ
और कितने नीचे लोग हैं यहाँ ,
किसकी तलाश में ,
कहाँ कहाँ से आते हैं यहाँ ,
आकर इन संकरी गलियों में,
न जाने कैसे खो जाते हैं लोग यहाँ !

ये शहर है,सपने बेचता है,
सपने खरीदता है और उन्ही से बनता है ,
ये ऊँची ऊँची इमारतें !


राजीव सिंह