Thursday, October 27, 2011

"जाने वो कौन सी बस्ती है "



ये शाम महकती और ये रात सुहानी 
अब सूनी सूनी सी लगती है ,
ये सुबह सुनहरी और भरी दुपहरी 
अब तो मुझपर हंसती है ,

सूनी सहमी बोझल आँखें,
 रह रह कर शायद यह ही कहती हैं ,
जाना है जिस देश मुझे अब 
जाने वो कौन सी बस्ती है !!

अपने घर की  ही  हर चीज़ पराई लगती है, 
अपनी  ही बस्ती का हर चेहरा अनजाना सा लगता है ,

कांपती सांसें आते जाते रुक रुक कर ,
शायद यह ही  कहती हैं, 
जाना है जिस देश मुझे अब 
जाने वो कौन सी बस्ती है !!

जीवन की है यह रीति पुरानी, 
कभी न ठहरे बहता पानी ,
इस साहिल से उस साहिल तक  जाना ,
हर जीवन की है यही कहानी,

डूबती कश्ती टूटती  सांसें जाते जाते, 
हर बार यही तो कहती हैं ,
जाना है जिस देश उन्हे अब, 
जाने वो कौन सी बस्ती है ....!!

"जाने वो कौन सी बस्ती है "

राजीव सिंह 




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