Saturday, October 29, 2011

.याद तुम्हारी ..!


मन के
 अंधियारे में जलती, 
एक दीप सी, 
आँखों से छु लेती ...
पोर पोर में जैसे 
फुलझड़ियाँ लिख देती....
घोर अमावास के प्रस्ठों पर 
चाँद दीप सी ..
बस्ती जब सो जाती 
याद तुम्हारी सुने  घर  में 
शहनाई सी गाती ...
भीड़ भरे इस कोलाहल में 
एक मौन सीप सी.......
... है याद तुम्हारी ..!

Thursday, October 27, 2011

"जाने वो कौन सी बस्ती है "



ये शाम महकती और ये रात सुहानी 
अब सूनी सूनी सी लगती है ,
ये सुबह सुनहरी और भरी दुपहरी 
अब तो मुझपर हंसती है ,

सूनी सहमी बोझल आँखें,
 रह रह कर शायद यह ही कहती हैं ,
जाना है जिस देश मुझे अब 
जाने वो कौन सी बस्ती है !!

अपने घर की  ही  हर चीज़ पराई लगती है, 
अपनी  ही बस्ती का हर चेहरा अनजाना सा लगता है ,

कांपती सांसें आते जाते रुक रुक कर ,
शायद यह ही  कहती हैं, 
जाना है जिस देश मुझे अब 
जाने वो कौन सी बस्ती है !!

जीवन की है यह रीति पुरानी, 
कभी न ठहरे बहता पानी ,
इस साहिल से उस साहिल तक  जाना ,
हर जीवन की है यही कहानी,

डूबती कश्ती टूटती  सांसें जाते जाते, 
हर बार यही तो कहती हैं ,
जाना है जिस देश उन्हे अब, 
जाने वो कौन सी बस्ती है ....!!

"जाने वो कौन सी बस्ती है "

राजीव सिंह 




Tuesday, October 11, 2011

इस बार मिली तो .......


कई बार, तेज़ रफ़्तार से जाते हुए ..मैंने उसको देखा था ..आस भरी नज़र से,  मेरी तरफ देखते हुए ..मानो.. मुझसे कहती थी,  कुछ पल के लिए ही  सही,   मुझे साथ ले लो ..तुम्हे सुकून मिलेगा ..दिल में एक हूक  सी  उठती पर कभी उसके साथ  रह सकूं, ये हो न सका  ....हमेशा सोचता.. कुछ दूर और चल लूं फिर पूरा जीवन इसके  साथ ही  रहना है  ..और अक्सर उसे अनदेखा कर आगे बढ़ जाता था ...


आज कल कई दिनों से.. वो दिखाई नहीं देती, ..न जाने कहाँ चली गयी, ...कुछ खोया खोया सा लगता है,...एक सूनापन सा ...आस पास एक खालीपन सा दीखता है, .. जीवन की इस आपाधापी में , अब सिर्फ उसकी यादें हैं..!

कई बार, जब दौड़ते दौड़ते ,शरीर और मन, दोनों ही  थक जाते हैं, तो उसकी  याद बहुत आती है ,..जाने कहाँ है.. दूर दूर तक दिखाई नहीं देती है ,.. सड़क के इस पार, ना उस पार, शायद रूठ गयी होगी, इतना अनदेखा जो किया ...काश एक बार मिल जाती ..!



आज कल बड़े ध्यान से.. अपने चारो ओर.. देखता चलता हूँ ..रुक रुक कर कुछ खोजता चलता हूँ... जाने कहाँ, किस मोड़ पर, जीवन की इन तिरछी टेढ़ी पथरीली राहों में , किसी किनारे पर, मुड़ी ,तुड़ी , पड़ी हुई मिल जाये ... इस बार मिली, तो झट से उठा लूँगा ,और कुछ पल  फुर्सत के साथ गुजार लूँगा ...

राजीव सिंह