Thursday, August 18, 2011

जब साँझ बची है जीवन में !!



हर पत्ता अब टूट चूका है 
हर टहनी अब सूख चुकी है
सांसों की माला टूट रही है
अब साँझ बची है जीवन में 
एक उम्र गुजारी है हमने 
दूर दूर तक फैले इस वीराने में !



बरसो से ये मन प्यासा है 
भीड़ भरी इस दुनिया में 
तनहा और अकेला है 
लहरें तट से टकरा टकरा कर 
जाने कब की लौट चुकी हैं 
मन मीत मेरे तुम अब आये हो 
जब सांसो की माला टूट रही है 
जब साँझ बची है जीवन में !




पतझड़ आते और पत्ते सब गिर जाते 
कड़ी धुप में तब  टहनी टहनी जल जाती 
सावन बीता , बीता बसंत और बीत गयी बहार 
दिन महीने मौसम बीते , बीत गए इतने साल 
प्रीत की अपने ठंढी छाया
लेकर तुम अब लौटे हो 
जब सांसो की माला टूट रही है 
जब साँझ बची है जीवन में !!

राजीव सिंह

2 comments:

Ram said...

awesome...........

Rajeev Singh said...

Thanks Ram...!