Thursday, August 11, 2011

मां... तुम्हारी याद आई है!

 देह में  जमने लगी बहती नदी है 

साँस लेने में लगी पूरी सदी है 
चेतना पर धुंध छाई है 
मां... तुम्हारी याद आई है!

हम गगन में हैं 
न धरती पर 
बस हवावों में हवाएं हैं 
धूप की कुछ गुनगुनी किरनें 
ये तुम्हारी ही  दुआएं हैं 
कान जैसे सूर के पद सुन रहे हैं 
किन्तु मन के तार सब अवगुन रहे हैं 
गोद में सर रख ज़रा सो लूं 
फिर जनम भर रात जगाई है ! 


जंगलो से तू बचा लाइ 
एक बसंती अभय देकर 
लोरियां हम को सुनाती है 
फिर वही रंगीन लय लेकर 


प्यार से सर पर रखा आँचल तुम्हारा 
मैं तभी से युद्ध कोई भी न हारा

मां... तुम्हारी याद आई है! 





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