Sunday, August 28, 2011

चलता पथिक निरंतर !


जीवन के  एकाकी पथ पर 
अपने हाथों से,
अपने सारे स्वप्न लुटाकर, 
चलता पथिक निरंतर ! 

जीवन की आपाधापी में 
अपने मन से ,
अपना जीवन आधार भुलाकर,
चलता पथिक निरंतर !

जीवन की तिरछी, टेढ़ी पथरीली रहों पर 
पग अपने सहला सहला कर ,
थकता , रुकता  पर -
चलता पथिक निरंतर !

जीवन के लम्बे इस गलियारे में 
अगडित इसको  प्रश्न मिले, 
कुछ के उत्तर,  कुछ निर्रुत्तर, 
सोचता , समझता पर- 
चलता पथिक निरंतर !

जो बीत गया उनकी यादो को लेकर, 
कल के सपनो को आँखों में भरकर  ,  
सुख में , दुःख में, हँसता, रोता 
निःशब्द  और निरंतर 
चलता पथिक निरंतर ! 


राजीव सिंह 

Thursday, August 18, 2011

जब साँझ बची है जीवन में !!



हर पत्ता अब टूट चूका है 
हर टहनी अब सूख चुकी है
सांसों की माला टूट रही है
अब साँझ बची है जीवन में 
एक उम्र गुजारी है हमने 
दूर दूर तक फैले इस वीराने में !



बरसो से ये मन प्यासा है 
भीड़ भरी इस दुनिया में 
तनहा और अकेला है 
लहरें तट से टकरा टकरा कर 
जाने कब की लौट चुकी हैं 
मन मीत मेरे तुम अब आये हो 
जब सांसो की माला टूट रही है 
जब साँझ बची है जीवन में !




पतझड़ आते और पत्ते सब गिर जाते 
कड़ी धुप में तब  टहनी टहनी जल जाती 
सावन बीता , बीता बसंत और बीत गयी बहार 
दिन महीने मौसम बीते , बीत गए इतने साल 
प्रीत की अपने ठंढी छाया
लेकर तुम अब लौटे हो 
जब सांसो की माला टूट रही है 
जब साँझ बची है जीवन में !!

राजीव सिंह

Thursday, August 11, 2011

सपने और हकीकत




   कितने अलग होते हैं
  हकीकत से सपनें ,
सपने ,
 बुने जाते हैं 
  सम्भावानावों के सुनहरे धागों से
हकीकत, 
उलझ कर रह जाती है  
अनगिनत अधूरे ख्वाबों में

 सपने,
जीने की वजह 
हकीकत जीने को कहते हैं 
सपने दूर कहीं मन के आसमान में 
हकीकत यहीं ज़मीन पर होती है 
आने वाली खुशियों के ताने बने से बुने 
सपने सिर्फ सुन्दर होते हैं
और हकीकत कई रंगों की
इन्द्रधनुषी या बेरंगी 
निर्भर करती है
सपनों के पूरे या अधूरे रह जाने पर  !
सपने इंसान बुनता है
हकीकत न जाने कहाँ से आती है
   सपनों पर इन्सान का बस चलता है 
 हकीकत इन्सान स्वीकार करता है 
  इसीलिए सिर्फ सपने अपने हैं
   और यही हकीकत है इन्सान की   !!

राजीव सिंह 

मां... तुम्हारी याद आई है!

 देह में  जमने लगी बहती नदी है 

साँस लेने में लगी पूरी सदी है 
चेतना पर धुंध छाई है 
मां... तुम्हारी याद आई है!

हम गगन में हैं 
न धरती पर 
बस हवावों में हवाएं हैं 
धूप की कुछ गुनगुनी किरनें 
ये तुम्हारी ही  दुआएं हैं 
कान जैसे सूर के पद सुन रहे हैं 
किन्तु मन के तार सब अवगुन रहे हैं 
गोद में सर रख ज़रा सो लूं 
फिर जनम भर रात जगाई है ! 


जंगलो से तू बचा लाइ 
एक बसंती अभय देकर 
लोरियां हम को सुनाती है 
फिर वही रंगीन लय लेकर 


प्यार से सर पर रखा आँचल तुम्हारा 
मैं तभी से युद्ध कोई भी न हारा

मां... तुम्हारी याद आई है!