Monday, April 04, 2011

शहर


कितनी ऊँची इमारतें हैं यहाँ
और कितने नीचे लोग हैं यहाँ ,
किसकी तलाश में ,
कहाँ कहाँ से आते हैं यहाँ ,
आकर इन संकरी गलियों में,
न जाने कैसे खो जाते हैं लोग यहाँ !

ये शहर है,सपने बेचता है,
सपने खरीदता है और उन्ही से बनता है ,
ये ऊँची ऊँची इमारतें !


राजीव सिंह 

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