Friday, November 04, 2011

मेरा मन......




अनंत आकाश की अनंत ऊँचाइयों में 
भटकता मेरा मन, 
तलाशता फिरता है अपने अस्तित्व को ,
कहाँ से चला , क्यूं और कैसे चला ,
इस तरह के एक विचार नहीं,
विचारों की गांठ में 
उलझ गया है मेरा मन ...!

यथार्थ  के इन प्रश्नों पर 
अपनी उर्जा व्यय करता ,
सागर की फिसलन भरी गहराइयों   में 
फिसलता हुआ ,
आ पहुंचा है उस बिंदु पर ,
जहाँ हर तरफ काई है 
जिसके स्पर्श मात्र से 
फिसलता जाता है, 
यथार्थ  से और अधिक दूर मेरा मन ..!

पीछे भागता है उस यथार्थ के, 
जो दिखाई देता है उस बिंदु पर, 
जहाँ आकाश का धरती से मिलन है, 
और इसी   रेगिस्तान सी मरीचिका में 
फंस कर रह गया है मेरा मन...!


क्या होगा इसका अस्तित्व 
और क्या यथार्थ ,
कब पहुंचेगा ये उस बिंदु पर 
और कब होगी खत्म इसकी तलाश, 
इन्ही प्रश्नों का हल तलाशता 
मुझसे कहीं दूर चला गया है मेरा मन.....!! 

राजीव सिंह 


Saturday, October 29, 2011

.याद तुम्हारी ..!


मन के
 अंधियारे में जलती, 
एक दीप सी, 
आँखों से छु लेती ...
पोर पोर में जैसे 
फुलझड़ियाँ लिख देती....
घोर अमावास के प्रस्ठों पर 
चाँद दीप सी ..
बस्ती जब सो जाती 
याद तुम्हारी सुने  घर  में 
शहनाई सी गाती ...
भीड़ भरे इस कोलाहल में 
एक मौन सीप सी.......
... है याद तुम्हारी ..!

Thursday, October 27, 2011

"जाने वो कौन सी बस्ती है "



ये शाम महकती और ये रात सुहानी 
अब सूनी सूनी सी लगती है ,
ये सुबह सुनहरी और भरी दुपहरी 
अब तो मुझपर हंसती है ,

सूनी सहमी बोझल आँखें,
 रह रह कर शायद यह ही कहती हैं ,
जाना है जिस देश मुझे अब 
जाने वो कौन सी बस्ती है !!

अपने घर की  ही  हर चीज़ पराई लगती है, 
अपनी  ही बस्ती का हर चेहरा अनजाना सा लगता है ,

कांपती सांसें आते जाते रुक रुक कर ,
शायद यह ही  कहती हैं, 
जाना है जिस देश मुझे अब 
जाने वो कौन सी बस्ती है !!

जीवन की है यह रीति पुरानी, 
कभी न ठहरे बहता पानी ,
इस साहिल से उस साहिल तक  जाना ,
हर जीवन की है यही कहानी,

डूबती कश्ती टूटती  सांसें जाते जाते, 
हर बार यही तो कहती हैं ,
जाना है जिस देश उन्हे अब, 
जाने वो कौन सी बस्ती है ....!!

"जाने वो कौन सी बस्ती है "

राजीव सिंह 




Tuesday, October 11, 2011

इस बार मिली तो .......


कई बार, तेज़ रफ़्तार से जाते हुए ..मैंने उसको देखा था ..आस भरी नज़र से,  मेरी तरफ देखते हुए ..मानो.. मुझसे कहती थी,  कुछ पल के लिए ही  सही,   मुझे साथ ले लो ..तुम्हे सुकून मिलेगा ..दिल में एक हूक  सी  उठती पर कभी उसके साथ  रह सकूं, ये हो न सका  ....हमेशा सोचता.. कुछ दूर और चल लूं फिर पूरा जीवन इसके  साथ ही  रहना है  ..और अक्सर उसे अनदेखा कर आगे बढ़ जाता था ...


आज कल कई दिनों से.. वो दिखाई नहीं देती, ..न जाने कहाँ चली गयी, ...कुछ खोया खोया सा लगता है,...एक सूनापन सा ...आस पास एक खालीपन सा दीखता है, .. जीवन की इस आपाधापी में , अब सिर्फ उसकी यादें हैं..!

कई बार, जब दौड़ते दौड़ते ,शरीर और मन, दोनों ही  थक जाते हैं, तो उसकी  याद बहुत आती है ,..जाने कहाँ है.. दूर दूर तक दिखाई नहीं देती है ,.. सड़क के इस पार, ना उस पार, शायद रूठ गयी होगी, इतना अनदेखा जो किया ...काश एक बार मिल जाती ..!



आज कल बड़े ध्यान से.. अपने चारो ओर.. देखता चलता हूँ ..रुक रुक कर कुछ खोजता चलता हूँ... जाने कहाँ, किस मोड़ पर, जीवन की इन तिरछी टेढ़ी पथरीली राहों में , किसी किनारे पर, मुड़ी ,तुड़ी , पड़ी हुई मिल जाये ... इस बार मिली, तो झट से उठा लूँगा ,और कुछ पल  फुर्सत के साथ गुजार लूँगा ...

राजीव सिंह 

Sunday, August 28, 2011

चलता पथिक निरंतर !


जीवन के  एकाकी पथ पर 
अपने हाथों से,
अपने सारे स्वप्न लुटाकर, 
चलता पथिक निरंतर ! 

जीवन की आपाधापी में 
अपने मन से ,
अपना जीवन आधार भुलाकर,
चलता पथिक निरंतर !

जीवन की तिरछी, टेढ़ी पथरीली रहों पर 
पग अपने सहला सहला कर ,
थकता , रुकता  पर -
चलता पथिक निरंतर !

जीवन के लम्बे इस गलियारे में 
अगडित इसको  प्रश्न मिले, 
कुछ के उत्तर,  कुछ निर्रुत्तर, 
सोचता , समझता पर- 
चलता पथिक निरंतर !

जो बीत गया उनकी यादो को लेकर, 
कल के सपनो को आँखों में भरकर  ,  
सुख में , दुःख में, हँसता, रोता 
निःशब्द  और निरंतर 
चलता पथिक निरंतर ! 


राजीव सिंह 

Thursday, August 18, 2011

जब साँझ बची है जीवन में !!



हर पत्ता अब टूट चूका है 
हर टहनी अब सूख चुकी है
सांसों की माला टूट रही है
अब साँझ बची है जीवन में 
एक उम्र गुजारी है हमने 
दूर दूर तक फैले इस वीराने में !



बरसो से ये मन प्यासा है 
भीड़ भरी इस दुनिया में 
तनहा और अकेला है 
लहरें तट से टकरा टकरा कर 
जाने कब की लौट चुकी हैं 
मन मीत मेरे तुम अब आये हो 
जब सांसो की माला टूट रही है 
जब साँझ बची है जीवन में !




पतझड़ आते और पत्ते सब गिर जाते 
कड़ी धुप में तब  टहनी टहनी जल जाती 
सावन बीता , बीता बसंत और बीत गयी बहार 
दिन महीने मौसम बीते , बीत गए इतने साल 
प्रीत की अपने ठंढी छाया
लेकर तुम अब लौटे हो 
जब सांसो की माला टूट रही है 
जब साँझ बची है जीवन में !!

राजीव सिंह

Thursday, August 11, 2011

सपने और हकीकत




   कितने अलग होते हैं
  हकीकत से सपनें ,
सपने ,
 बुने जाते हैं 
  सम्भावानावों के सुनहरे धागों से
हकीकत, 
उलझ कर रह जाती है  
अनगिनत अधूरे ख्वाबों में

 सपने,
जीने की वजह 
हकीकत जीने को कहते हैं 
सपने दूर कहीं मन के आसमान में 
हकीकत यहीं ज़मीन पर होती है 
आने वाली खुशियों के ताने बने से बुने 
सपने सिर्फ सुन्दर होते हैं
और हकीकत कई रंगों की
इन्द्रधनुषी या बेरंगी 
निर्भर करती है
सपनों के पूरे या अधूरे रह जाने पर  !
सपने इंसान बुनता है
हकीकत न जाने कहाँ से आती है
   सपनों पर इन्सान का बस चलता है 
 हकीकत इन्सान स्वीकार करता है 
  इसीलिए सिर्फ सपने अपने हैं
   और यही हकीकत है इन्सान की   !!

राजीव सिंह 

मां... तुम्हारी याद आई है!

 देह में  जमने लगी बहती नदी है 

साँस लेने में लगी पूरी सदी है 
चेतना पर धुंध छाई है 
मां... तुम्हारी याद आई है!

हम गगन में हैं 
न धरती पर 
बस हवावों में हवाएं हैं 
धूप की कुछ गुनगुनी किरनें 
ये तुम्हारी ही  दुआएं हैं 
कान जैसे सूर के पद सुन रहे हैं 
किन्तु मन के तार सब अवगुन रहे हैं 
गोद में सर रख ज़रा सो लूं 
फिर जनम भर रात जगाई है ! 


जंगलो से तू बचा लाइ 
एक बसंती अभय देकर 
लोरियां हम को सुनाती है 
फिर वही रंगीन लय लेकर 


प्यार से सर पर रखा आँचल तुम्हारा 
मैं तभी से युद्ध कोई भी न हारा

मां... तुम्हारी याद आई है! 





Tuesday, June 07, 2011

हमारे आस पास ही रहते हैं ये लोग भी


हमारे आप जैसे लोग हैं ये भी ,
हमारे आस पास ही  रहते हैं ये भी ,
इनके भी सीने में दिल है और आँखों में सपने हैं ,
ये भी रोते हैं, हँसते हैं और अपनी फिक्र को धुंए में उड़ाते हैं ,
ये भी जीते हैं अपनों के लिए जैसे हम और आप ,
नज़र घुमा कर देखिये अपने आस पास ,
दर्द भरे चेहरे पर मुस्कराहट की चादर ओढ़े हुए ,
हमारे आस पास ही  रहते हैं ये लोग भी !!

राजीव सिंह 

Tuesday, April 05, 2011

तुम महान हो


 तुम
सुच -मच
महान हो ,
कभी न मिलने वाले
किनारे भी ,
मिलाकर
असंभव को संभव कर दिया है
छोटे गाँव को
शहर से जोड़
दिया है |
वीरानों को
भीड़ से मिला दिया है |
रिश्तों को
दिलों से जोड़
दिया है |
नई-नई  आशाओं को
साकार किया है |
पुल !! सचमुच
तुम महान हो |!

Monday, April 04, 2011

मैं सपने देखता हूँ


(१)
मैं सपने देखता हूँ
सुन्दर और सतरंगी
मेरे सपनों में जीवन है
नदियाँ और झरने हैं
सागर और सूरज, चाँद, तारे और नदी के किनारे हैं
हवावों में गीत, जीवन में संगीत
ऊँचा पर्वत , गहरा सागर
लहराते पेड़ , लहलहाते खेत
कभी आंसू और कभी मुस्कान
सब कुछ है !
(2)
मैं सपने देखता हूँ
सुन्दर और सतरंगी
मेरे सपनो में मैं हूँ
कुछ अपने और  कुछ अनजाने हैं
राहें  पथरीली, रास्ता अनजाना 
पर मंजिल जानी  पहचानी है 
हाँ बिलकुल पहचानी है
शिखर पर मैं और मेरे साथ वही सपने 
सुन्दर और सतरंगी

राजीव सिंह

शहर


कितनी ऊँची इमारतें हैं यहाँ
और कितने नीचे लोग हैं यहाँ ,
किसकी तलाश में ,
कहाँ कहाँ से आते हैं यहाँ ,
आकर इन संकरी गलियों में,
न जाने कैसे खो जाते हैं लोग यहाँ !

ये शहर है,सपने बेचता है,
सपने खरीदता है और उन्ही से बनता है ,
ये ऊँची ऊँची इमारतें !


राजीव सिंह