Thursday, August 27, 2009

शायद .................



माथे पर लकीरें और होठों पर बुदबुदाहट
अपने आप से या किसी अपने से बतियाता
तनपर परती हुई बारिश की बूंदों
और आते जाते लोगों की नज़रो से बेखबर
सड़क के किनारे बैठा
मैंने देखा उससे बुनते
न जाने कौन से ख्याल
कभी हँसता और अगले ही
पल आँखे कुछ नम हो जाती
ऐसा क्या था >?
जो वो वहां होकर भी वहां नहीं था
शायद कुछ सपने टूटे होंगे !
शायद कुछ अपने रूठे होंगे !
शायद ------------- !
राजीव सिंह