कभी ये मकान एक घर हुआ करता था
आज का यह खँडहर कभी महल हुआ करता था
इसके सूने और सहमे आँगन में
कभी चुरियो की खनक और पायल की छनक गूंजती थी
baher aur bheetar हर ओर पसरा यह सन्नाटा
कभी बच्चो की किलकारियों से खिलखिलाता था
एक अदद रौशनी को tarasta इस खँडहर का हर एक कोना
कभी अपनों की खुशियों में रोशन और
उनके गम में आशा के दीप जलाता था
किसी इतिहास के फटे हुए पन्ने की तरह
आज घुप अंधेरे कोनो में टिमटिमाती खिड़कियों ने
सुनहरे भविष्य की आस में एक एक कर
कभी अपने बर्तमान को जाते देखा था
राजीव सिंह
आज का यह खँडहर कभी महल हुआ करता था
इसके सूने और सहमे आँगन में
कभी चुरियो की खनक और पायल की छनक गूंजती थी
baher aur bheetar हर ओर पसरा यह सन्नाटा
कभी बच्चो की किलकारियों से खिलखिलाता था
एक अदद रौशनी को tarasta इस खँडहर का हर एक कोना
कभी अपनों की खुशियों में रोशन और
उनके गम में आशा के दीप जलाता था
किसी इतिहास के फटे हुए पन्ने की तरह
आज घुप अंधेरे कोनो में टिमटिमाती खिड़कियों ने
सुनहरे भविष्य की आस में एक एक कर
कभी अपने बर्तमान को जाते देखा था
राजीव सिंह
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