Wednesday, September 23, 2009

तुम दूर होती हो तो याद आती हो

तुम दूर होती हो तो याद आती हो
बारिश की बूंदों सी , शर्माती और  सकुचाती सी
हर बात  पर मुस्का  देती , फूलों की पंखुरियों  सी
हंसती और हंसा देती , रोती और रुला देती
इठलाती और बलखाती, बगिया में  एक तितली  सी..
तुम दूर  होती हो  तो याद आती हो !!

तुम से  मिलकर तुमसे जाना , जीवन की  है क्या  परिभाषा
क्या होता है  नदी का  बहना , क्या होता है पवन का चलना
कितना गहरा सागर होगा, कितना ऊँचा  अम्बर  होगा
फूलों में है  रस कितना, भंवरा होगा प्यासा कितना
तुम दूर होती हो तो  याद आती हो..

जीवन की तिरछी, टेढ़ी , पथरीली  राहों पर
आगे बढ़ते रहने की चाहत देती
तपती दोपहरी में ,THUNDH हवा के झोंके सी
और कड़ी धूप में, ठंढी  शीतल छाया सी
साँझ ढले  तो रात  की दुल्हन , भोर होते ही नवजीवन  सी
तुम दूर होती हो तो याद आती हो

इतिहास


कभी ये मकान एक घर हुआ करता था
आज का यह खँडहर कभी महल हुआ करता था
इसके सूने और सहमे आँगन में
कभी चुरियो की खनक और पायल की छनक गूंजती थी
baher aur bheetar हर ओर पसरा यह सन्नाटा
कभी बच्चो की किलकारियों से खिलखिलाता था
एक अदद रौशनी को tarasta इस खँडहर का हर एक कोना
कभी अपनों की खुशियों में रोशन और
उनके गम में आशा के दीप जलाता था
किसी इतिहास के फटे हुए पन्ने की तरह
आज घुप अंधेरे कोनो में टिमटिमाती खिड़कियों ने
सुनहरे भविष्य की आस में एक एक कर
कभी अपने बर्तमान को जाते देखा था
राजीव सिंह